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माँ कात्यायनी (Maa Katyayani Aarti) – कात्यायन ऋषि के यहाँ जन्म लेने के कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ा। सिंह पर सवार इन देवी की भी चार भुजाएं हैं और शिक्षा व विवाह दोनों ही क्षेत्रों में भक्तों की सहायता करती हैं। रोग, शोक और भय नाशिनी देवी ने अपने इसी रूप में महिसासुर का वध किया था, अतः महिषासुर मर्दिनी नाम से जानी गईं। इनकी पूजा के लिए शहद का प्रयोग लाभकारी सिद्ध होता है। षष्ठी तिथि को सर्वप्रथम कलश व कात्यायनी माता का पूजन करें, इसके लिए हाथ में पुष्प लेकर देवी को प्रणाम कर, उनका स्मरण करें और फिर पुष्प समर्पित कर दें। इसके उपरांत शंकर भगवान, परम पिता और हरि भगवान की लक्ष्मी सहित पूजा करें तभी आपकी आराधना संपन्न होगी। शंखनाद एवं भंडारे देवी को प्रिय हैं, इसीलिए संभव हो तो ये भी करें।
शीघ्र विवाह हेतु या विवाह में आ रही परेशानियों से मुक्ति हेतु माँ कात्यायनी का व्रत रखना सबसे उत्तम उपाय है। इस व्रत का वर्णन भगवद महापुराण के 22वें अध्याय के 10वें स्कंध में मिलता है। इस व्रत के पीछे एक कथा है। एक बार ब्रज के ग्वालों की पुत्रियों ने माघ (मार्गशीर्ष) के पूरे महीने देवी का व्रत किया। इस पूरे माह सारी गोपियाँ सिर्फ बिना मसाले की खिचड़ी खाकर रहीं, और सूर्योदय से पूर्व ही स्नान करके माँ कात्यायनी की स्तुति करती रहीं एवं वरदान में श्री कृष्ण को पति रूप में माँगा। व्रत से माँ प्रसन्न हुईं और फलस्वरूप उन गोपियों को कृष्ण भगवान पति रूप में प्राप्त हुए। कात्यायनी माता की जय !
“चन्द्र हासोज्ज वलकरा शार्दूलवर वाहना |
कात्यायनी शुभंदद्या देवी दानव घातिनी ||”
जो साधक कुण्डलिनी जागृत करने की इच्छा से देवी अराधना में समर्पित हैं उन्हें दुर्गा पूजा के छठे दिन माँ कात्यायनी जी की सभी प्रकारसे विधिवत पूजा अर्चना करनी चाहिए फिर मन को आज्ञा चक्र में स्थापित कर सर्वप्रथम कलश और हाथों में फूललेकर देवी को प्रणाम कर देवी के मंत्र का ध्यानअर्थ, कर्म, काम, मोक्ष प्राप्ति के लिए पूजा करनी चाहिए |
जय कात्यायनि माँ, मैया जय कात्यायनि माँ । उपमा रहित भवानी, दूँ किसकी उपमा ॥
गिरजापति शिव का तप, असुर रम्भ कीन्हाँ । वर-फल जन्म रम्भ गृह, महिषासुर लीन्हाँ ॥
कर शशांक-शेखर तप, महिषासुर भारी । शासन कियो सुरन पर, बन अत्याचारी ॥
त्रिनयन ब्रह्म शचीपति, पहुँचे, अच्युत गृह । महिषासुर बध हेतू, सुर कीन्हौं आग्रह ॥
सुन पुकार देवन मुख, तेज हुआ मुखरित । जन्म लियो कात्यायनि, सुर-नर-मुनि के हित ॥
अश्विन कृष्ण-चौथ पर, प्रकटी भवभामिनि । पूजे ऋषि कात्यायन, नाम काऽऽत्यायिनि ॥
अश्विन शुक्ल-दशी को, महिषासुर मारा । नाम पड़ा रणचण्डी, मरणलोक न्यारा ॥
दूजे कल्प संहारा, रूप भद्रकाली । तीजे कल्प में दुर्गा, मारा बलशाली ॥
दीन्हौं पद पार्षद निज, जगतजननि माया । देवी सँग महिषासुर, रूप बहुत भाया ॥
उमा रमा ब्रह्माणी,सीता श्रीराधा । तुम सुर-मुनि मन-मोहनि, हरिये भव-बाधा ॥
जयति मङ्गला काली, आद्या भवमोचनि । सत्यानन्दस्वरूपणि,महिषासुर-मर्दनि ॥
जय-जय अग्निज्वाला, साध्वी भवप्रीता । करो हरण दुःख मेरे, भव्या सुपुनीता॥
अघहारिणि भवतारिणि, चरण-शरण दीजै । हृदय-निवासिनि दुर्गा, कृपा-दृष्टि कीजै ॥
ब्रह्मा अक्षर शिवजी, तुमको नित ध्यावै ।करत ‘अशोक’ नीराजन, वाञ्छितफल पावै॥
मैया जय कात्यायनि…
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