ज़रा हटके

हवा में घुमाने भर से बजती है ये बांसुरी, मगर इस वजह से होने जा रही लुप्त

Swinging Bamboo Flutes: जब बांसुरी की बात होती है, तो आपके उसी बांसुरी का ध्यान आता है, जिसमें जब आप मुंह से फूंक मारते हैं तो इससे मधुर आवाज निकलती है। लेकिन एक बांसुरी ऐसी भी है, जिसे बजाने के लिए मुंह लगाने की जरूरत नहीं होती है।

बांसुरी में केवल दो ही छेद

इसमें केवल दो ही छेद होते हैं। जब आप इसे हवा में लहराते हैं, तो इसके अंदर से गुजरने वाली हवा से यह बांसुरी संगीत की मधुर धुन निकालने लगती है।

इस बांसुरी के अंदर से निकलने वाला संगीत जितना मधुर है, इसके पीछे उतना ही दर्द भी छिपा हुआ है। यहां हम आपको इसीलिए छत्तीसगढ़ के मनीराम मंडावी के बारे में बता रहे हैं।

जंगली जानवरों को भगाने के आती है काम

छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में गढ़ बेंगाल नाम का एक गांव है। यहां मनीराम रहते हैं, जिनकी उम्र 42 साल की है। बांस से वे कई तरह की कलाकृतियां तैयार करते हैं। बांसुरी भी इन्हीं में से एक है। जो धुन इस बांसुरी से बाहर आती है, इससे जंगली जानवर भी भाग जाते हैं।

मनीराम इसके बारे में बताते हैं कि चीता, बाघ और भालू जैसे जानवर जो पहले जंगल में हुआ करते थे, इन्हें भगाने के लिए केवल इस बांसुरी को हवा(Swinging Bamboo Flutes) में घुमाना होता था। इसकी आवाज को सुनकर वे तुरंत भाग खड़े होते थे।

इतना भी आसान नहीं इस बांसुरी को बनाना

इस बांसुरी को बनाना इतना भी आसान नहीं है, क्योंकि बांस को काटने-छांटने से लेकर डिजाइन बनाने तक में कई घंटे का वक्त लग जाता है। प्रदर्शनी में भी मनीराम इस बांसुरी को लेकर जाते हैं, मगर उन्हें इस बात का दुख है कि उन्हें बाजार में 300 रुपये की बिकने वाली बांसुरी सिर्फ 50 रुपये में भी बेचनी पड़ती है। इस तरह से उन्हें अपनी मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिल पाता है।

मनीराम ने यूं सीखी थी यह कला

लगभग 30 साल पहले सिर्फ 15 वर्ष की उम्र में मनीराम ने उस्ताद मंदार सिंह मंडावी से यह कला सीखी थी। मनीराम का अबूझमाड़ (ओरछा) ब्लॉक के जंगलों में गोंड आदिवासी समुदाय की बस्ती में एक छोटा सा वर्कशॉप है। बांसुरी नहीं बनाने के वक्त अपनी 2 एकड़ की जमीन पर मनीराम खेती भी करते हैं, ताकि इससे होने वाली अतिरिक्त आय से अपनी पत्नी और 3 बच्चों का भी पेट भर सकें।

अब जाना पड़ता है 10 किलोमीटर दूर

जंगलों के कटने से दुखी मनीराम भावुक होकर बताते हैं कि लगभग 20 साल पहले यहां जंगल होने से बांस आसानी से मिल जाते थे, लेकिन अब बांसुरी के लिए बांस लाने के लिए उन्हें लगभग 10 किलोमीटर पैदल चलकर नारायणपुर शहर जाना पड़ता है। जंगल खत्म होने से बांसुरी बनाना भी अब कठिन होता जा रहा है।

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मनीराम कहते हैं कि जंगलों को बचाने की दिशा में सरकार भी तभी कुछ कर सकती है, जब हमारे आदिवासी भाई भी इसमें सहयोग करें।

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Shailesh Kumar

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