MDH Owner Story in Hindi: कहते हैं किस्मत से पहले और किस्मत से ज्यादा किसी को कुछ नहीं मिलता है। आपकी किस्मत में जो जब लिखा होता है वो तभी आपको मिल पाता है। हालांकि, आपने एक कहावत और सुनी होगी कि अगर आपको मन में हौसला है और अपनी मंजिल को पाने की चाहत, तो भगवान भी आपको उस कामयाबी तक पहुंचा देते हैं।

आज हम आपको एक ऐसे ही शख्स की कहानी के बारे में बताएंगे जिन्होंने सिर्फ अपने हुनर और मेहनत के साथ काम किया और आज वो पूरे देश और दुनिया में जाने जाते हैं। यहां तक कि उनको पद्म विभूषण पुरस्कार से भी नवाजा गया है। हम बात कर रहे हैं मसालों के शहंशाह कहे जाने वाले  एमडीएच के फाउंडर और मसाला व्यापारी महाशय धर्मपाल गुलाटी की।

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बता दें कि साल 2019 में मार्च महीने में दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द ने धर्मपाल गुलाटी को पद्म भूषण, पद्म विभूषण और पद्मश्री पुरस्कार दिए। इन पुरस्कारों में मिलने वाली लिस्ट में कुल 54 नाम शामिल थे। राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने इस दिन 54 हस्तियों को पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किया और इन्हीं 54 लोगों में एमडीएच के फाउंडर और मसाला व्यापारी धर्मपाल गुलाटी का नाम भी शामिल था। यह सम्मान मिलना किसी के लिए किसी गौरव से कम नहीं है।

आज महाशय धर्मपाल जी जिस जगह पर हैं और उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है उसके पीछे की कहानी तो बहुत ही कम लोगों को पता होगी। शायद ही कोई जानता हो कि जब उन्होंने मसालों के व्यापार को शुरू किया था तो वो पूरे भारत में तांगे से जाकर अपना काम करते थे और अपने मसालों को बेचते थे और देखते ही देखते आज वो मसालों के किंग बन गए हैं।

महाशय धर्मपाल का जीवन [MDH Owner Story in Hindi]

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धर्मपाल का जन्म 27 मार्च को साल 1923 में सियालकोट में हुआ था। हालांकि, विभाजन के बाद सियालकोट पाकिस्तान में चला गया है। धर्मपाल ने कक्षा 5 तक ही पढ़ाई की और उसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। जिसके बाद उन्होंने साल 1937 में अपने पिता की मदद से अपना खुद का व्यापार करना शुरू किया। उन्होंने साबुन, बढ़ई, कपड़े, हार्डवेयर चावल हर तरह के व्यापार में हाथ आजमाया लेकिन इन सबमें उन्हें कोई खास सफलता नहीं मिली। लेकिन धर्मपाल ने कभी हार नहीं मानी।

काफी समय तक बिना किसी काम के रहने के बाद उन्होंने एक बार फिर से अपने पिता के साथ मिलकर व्यापार करना शुरू किया। उनके पिता की महेशियां दी हट्टी नाम की एक दुकान थी और धर्मपाल ने अपने पिता की दुकान में काम करना शुरू कर दिया जिसके बाद उनको देगी मिर्च के नाम से जाना जाता था।

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बता दें कि साल 1947 में भारत और पाकिस्तान के हुए विभाजन के बाद धर्मपाल अपने परिवार वालों के साथ भारत के दिल्ली शहर आ गए और जब वो दिल्ली आए तब उनकी जेब में महज 1500 रूपए थे। नया देश जिसके बारे में कुछ भी नहीं जानते थे। दिल्ली आकर अपना गुजर बसर करने के लिए धर्मापल ने 650 रूपए का तांगा खरीदा और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के कुतुब रोड के बीच तांगा चलाया।

धर्मपाल ने तांगे के जरिए अपने परिवार के गुजर बसर करने का साधन निकाला और फिर उन्होंने मसालों का व्यापार शुरू किया। पहले वो खुद तांगे से जाकर देश के कोने-कोने में अपना मसाला बेचकर आते थे। इसे उनकी मेहनत, लगन और विश्वास ही कहेंगे कि इतना सब होने के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और आज देश के मसालों के किंग बने बैठे हैं। आपको भी सोचकर आश्चर्य हो रहा होगा कि आखिर 5वीं पास लड़का इतनी कामयाबी कैसे हासिल कर सकता है, लेकिन धर्मपाल इसका जीता जागता उदाहरण हैं।

बता दें कि आज वो जिस मुकाम पर पहुंचे हैं, उनके मसाले सिर्फ भारत देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में काफी ज्यादा फेमस है। उनकी कंपनी अब 60 से भी ज्यादा तरह के मसाले तैयार करती और उनके मसालों का निर्यात पूरी दुनिया में होता है। धर्मपाल गुलाटी को व्यापार और प्रसंस्करण के क्षेत्र में बेहतर योगदान के लिए पद्म भूषण अवॉर्ड दिया गया है।

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धर्मपाल एक अच्छे व्यापारी होने के साथ देश का अच्छा और हित में सोचने वाले नागरिक भी हैं। धर्मपाल ने समाज के हित में भी काफी काम किए हैं। उन्होंने देशभर में कई अस्पताल, स्कूल बनवाएं हैं जिससे देश का भविष्य और वर्तमान सभी सुरक्षित औऱ अच्छा रहे। धर्मपाल अब तक लगभग 20 स्कूलों को खुलवा चुके हैं।

धर्मपाल की कहानी सुनकर तो एक बात साफ होती है कि यदि आप अपने मन में कुछ पाने की दृढ़ निश्चय कर लें तो आप अपनी मंजिल तक पहुंच ही जाते हैं। जब भी किसी चीज की शुरूआत करें तो उसको सच्चे मन और लगन से करें, समय के साथ आपकी मेहनत रंग जरूर लाती है। धर्मपाल की तरह देश में ना जानें और भी कितने नामी गिरामी चेहरे हैं, जिन्होंने बहुत नीचे स्तर से अपने काम की शुरूआत की औऱ आज वो एक अच्छे मुकाम पर पहुंच गए हैं।

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