रामगोपाल वर्मा का फिल्मो के ज़रिये चीज़ें सुधारने का निरंतर प्रयास पूरी तरह से विफल रहा है। हम जानते हैं कि दुनिया बदल रही है और अधिक पुरुष महिला और उनके सशक्तिकरण का समर्थन करने के लिए आगे आ रहे हैं। शायद यही वजह है कि राम गोपाल वर्मा आगे बढ़े और अपनी पहली लघु फिल्म ‘मेरी बेटी सनी लियोन बनना चाहती है’ बनाने के लिए इस विषय को चुना। लेकिन वास्तव में यह नहीं होना चाहिए था। जानिए क्यों?

महाशय, या तो आपने महिलाओं के सशक्तिकरण के विचार को पूरी तरह से गलत समझा है या फिर आपके लेखक ने आपको ‘मेरी बेटी सनी लियोन बनना चाहती है’ में उपयोग करने के लिए सबसे बुरे संवाद दिए हैं। फिल्म एक सभ्य नोट पर शुरू होती है जहां बेटी बताती है कि वह सनी लियोन जैसे अभिनेत्री बनना चाहती है। जाहिर है, उसके माता-पिता चौंक गए और उसे मनाने की कोशिश कर रहे हैं| लेकिन फिर एक बड़ा मसला बन जाता है क्योंकि वह यह कारण बताती है की उसे अपने कैरियर का चयन करने और लोगों के विचारों के बावजूद अपने जीवन के सभी महत्वपूर्ण निर्णयों को लेने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए।

विश्वास नहीं होता तो इस डायलाग पर गौर फरमायें- “एक औरत की सबसे बडी वैल्यू है उसकी सुंदरता और उसकी सेक्स अपील”। जी हाँ, यह सही है, यह कई निराधार कारणों में से एक है जिनका इस्तेमाल अभिनेत्री ने इस लघु फिल्म में किया है।

प्रिय महोदय,आप इन संवादों से क्या दर्शाने की कोशिश कर रहे हैं? क्योंकि हम आपका मूल बिंदु प्राप्त नहीं कर सके। खैर हम यह उम्मीद करते हैं कि आप लोग इसे समझ सकें।

एक महिला होने के नाते मैं यह कहना चाहूंगी कि मैं अपनी ज़िन्दगी अपने मुताबिक़ जीना चाहती हूँ और अपने लक्ष्यों का पीछा करना चाहती हूँ। लेकिन मैं एक व्यक्ति हूं जो जानता है कि भारत और इसका समाज महिलाओं को लेकर अपनी सोच धीरे धीरे विकसित कर रहा है और इसमें कुछ समय लगेगा। मैं अपने विकल्पों या काम्युक्ता से डरती नहीं हूं लेकिन मुझे यकीन है कि मैं खुद को एक वस्तु के रूप में कभी नहीं स्वीकार करना ​​चाहूंगी।

‘मेरी बेटी सनी लियोन बन्ना चौहती है’ पूरी तरह से महिला सशक्तिकरण की गलत व्याख्या करती है।

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