Gulzar Poetry in Hindi: शब्दों में जान कैसे डाली जाती है ये गुलज़ार से बेहतर भला और कौन जान सकता है। सीधे सादे शब्दों के ज़रिए गंभीर बात कहने की कला गुलज़ार (Gulzar) साहब बखूबी जानते हैं। आज शायद ही कोई हो जो इस नाम से वाकिफ ना हो। उनके संवाद, उनके गीत सीधे लोगों के दिलों में उतरते हैं। गुलज़ार नाम से तो प्रसिद्ध हुए जबकि इनका असल नाम था सम्पूर्ण सिंह कालरा। ये हिंदी फिल्मों के प्रसिद्ध गीतकार ही नहीं बल्कि एक कवि, पटकथा, लेखक, फिल्म निर्देशक और नाटककार भी हैं। लेकिन ऑस्कर और ग्रैमी अवॉर्ड से नवाज़े जा चुके गुलज़ार बतौर गीतकार ही सभी के दिलों पर राज करते हैं। तो चलिए आज अपने इस लेख में बताते हैं आपको गुलज़ार साहब की कुछ बेहतरीन नज़्मे जिनके लोग दीवाने हैं। 

गुलज़ार की गज़लें [Gulzar Shayari Hindi]

Gulzar Poetry In Hindi
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मैं अगर छोड़ न देता, तो मुझे छोड़ दिया होता, उसने

इश्क़ में लाज़मी है, हिज्रो- विसाल मगर

इक अना भी तो है, चुभ जाती है पहलू बदलने में कभी

रात भर पीठ लगाकर भी तो सोया नहीं जाता

उठता तो है घटा-सा बरसता नहीं धुआँ

चूल्हे नहीं जलाये या बस्ती ही जल गई

कुछ रोज़ हो गये हैं अब उठता नहीं धुआँ

आँखों के पोंछने से लगा आँच का पता

यूँ चेहरा फेर लेने से छुपता नहीं धुआँ

आँखों से आँसुओं के मरासिम पुराने हैं

मेहमाँ ये घर में आयें तो चुभता नहीं धुआँ

थोड़ी देर ज़रा-सा और वहीं रुकतीं तो…

सूरज झांक के देख रहा था खिड़की से 

एक किरण झुमके पर आकर बैठी थी,

और रुख़सार को चूमने वाली थी कि

तुम मुंह मोड़कर चल दीं और बेचारी किरण

फ़र्श पर गिरके चूर हुईं

थोड़ी देर, ज़रा सा और वहीं रूकतीं तो…

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई

जैसे एहसान उतारता है कोई

आईना देख के तसल्ली हुई

हम को इस घर में जानता है कोई

पक गया है शज़र पे फल शायद

फिर से पत्थर उछालता है कोई

फिर नज़र में लहू के छींटे हैं

तुम को शायद मुग़ालता है कोई

देर से गूँजतें हैं सन्नाटे

जैसे हम को पुकारता है कोई


आदमी बुलबुला है पानी का

और पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है,

फिर उभरता है, फिर से बहता है,

न समंदर निगल सका इसको, न तवारीख़ तोड़ पाई है,

वक्त की मौज पर सदा बहता आदमी बुलबुला है पानी का।

दिल में ऐसे ठहर गए हैं ग़म

जैसे जंगल में शाम के साये 

जाते-जाते सहम के रुक जाएँ 

मुड़के देखे उदास राहों पर 

कैसे बुझते हुए उजालों में 

दूर तक धूल ही धूल उड़ती है

कंधे झुक जाते है जब बोझ से इस लम्बे सफ़र के 

हांफ जाता हूँ मैं जब चढ़ते हुए तेज चढ़ाने 

सांसे रह जाती है जब सीने में एक गुच्छा हो कर

और लगता है दम टूट जायेगा यहीं पर 

एक नन्ही सी नज़्म मेरे सामने आ कर 

मुझ से कहती है मेरा हाथ पकड़ कर-मेरे शायर 

ला , मेरे कन्धों पे रख दे,

में तेरा बोझ उठा लूं 

देखो आहिस्ता चलो,और भी आहिस्ता ज़रा

देखना,सोच-समझकर ज़रा पाँव रखना 

जोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं

कांच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में 

ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जायें देखो

जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जायेगा

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

वक़्त की शाख़ से लम्हें नहीं तोड़ा करते

जिस की आवाज़ में सिलवट हो निगाहों में शिकन

ऐसी तस्वीर के टुकड़े नहीं जोड़ा करते

शहद जीने का मिला करता है थोड़ा थोड़ा

जाने वालों के लिये दिल नहीं थोड़ा करते

लग के साहिल से जो बहता है उसे बहने दो

ऐसी दरिया का कभी रुख़ नहीं मोड़ा करते

मचल के जब भी आँखों से छलक जाते हैं दो आँसू

सुना है आबशारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

खुदारा अब तो बुझ जाने दो इस जलती हुई लौ को

चरागों से मज़ारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

कहू क्या वो बड़ी मासूमियत से पूछ बैठे है

क्या सचमुच दिल के मारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

तुम्हारा क्या तुम्हें तो राह दे देते हैं काँटे भी

मगर हम खांकसारों को बड़ी तकलीफ़ होती है

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