गौरतलब है की  भारत में जनजातीय लोगों के बारे में पढ़ने या सुनने में चंद लोग ही उत्साहित होंगे ।

यह केवल दुर्लभ नहीं है, बल्कि कुछ अजीब होने के प्रक्षेपण में पड़ता है, शायद हम इसके बारे में ज्यादा सुनने के आदी नहीं हैं। आखिरी बार आपको आदिवासी भारत और इसे प्रभावित करने वाले मुद्दों के बारे में खबर प्रमुख दैनिक अख़बार के शुरुआती पृष्ठ पर कब मिली?

क्या आप भारत के पांच प्रमुख लेखकों का नाम दे सकते हैं जिन्होंने जनजातीय संस्कृति के लिए उत्साहजनक जुनून के साथ इनके संरक्षण के बारे में लिखा है ?

यदि ये आपको चिंतित करता है तो एक दुर्लभ और विशेष खबर आपके चेहरे पर मुस्कान ला सकती है।

महाराष्ट्र जनजातीय विभाग द्वारा संयुक्त रूप से चंद्रपुर कलेक्टरेट के साथ एक पहल के तहत, “शौर्य” के नाम से जाना जाने वाला एक मिशन लॉन्च किया गया था ताकि युवाओं को माउंट एवरेस्ट में सबसे ऊंची चोटी तक ले जाया सके । दिलचस्प बात यह है कि इन जनजातीय बच्चों में से किसी ने भी शायद माउंट एवरेस्ट के बारे में सुना तक नहीं  था ,हालांकि उन्होंने इस शिखर पर पहुँचने का मन बना लिया ।

उमाकांत मदवी (1 9), परमेष आले (1 9) और देवदा आश्रम स्कूल से मनीषा धुरवे (18), जिवाती अशराम स्कूल से कविदास कटमोड (18) ने सफलतापूर्वक एवेरेस्ट की चढ़ाई कर ये सुनिश्चित किया की कोई भी कार्य कठिन नहीं होता अगर आपमें कभी न हार मानने वाला जज़्बा हो ।

मिशन के लिए चुने गए उपरोक्त छात्रों को पूरी तरह से संयुक्त मिशन के अनुपालनों द्वारा निर्देशित किया गया था । दो छात्र : कविदास और उमाकांत शीर्ष पर 3 :25  बजे पहुंचे जबकि अन्य दो : परमेष और मनीषा 4.25 -4:35 बजे के आसपास पहुंचे । लगभग 8,848 मीटर के शिखर के शीर्ष तक पहुंचने का कार्य न केवल शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण है बल्कि चरम मानसिक कठोरता का विषय है।

उल्लेखनीय है कि देश के जनजातीय क्षेत्र  के चार उत्साही युवा जिन्होंने माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने की कभी कल्पना तक नहीं की  थी , न केवल उस पर सफलतापूर्ण चढ़ाई की बल्कि भारत के ध्वज को शीर्ष पर फहराया भी ।

इस चुनौतीपूर्ण लक्ष्य के लिए 10 छात्रों को चुना गया था जिन्हे 18 महीनो की कठोर ट्रेनिंग से गुज़ारना पड़ा। इस मिशन की चढ़ाई की शुरुआत चीन के अंतर्गत आने वाले क्षेत्र से की गयी थी जो की इस कार्य को और रोमांचक बनती है ।

शायद, देश को इस तरह के प्रेरणादायक उदाहरणों की आवश्यकता है। ये दुर्लभ काम हैं जो वास्तव में देश की अक्सर अनदेखी और अकाल्पनिक  संभावनाओं को चिह्नित करती हैं?

तो हम इस तरह की एक और विशेष उपलब्धि के बारे में कब सुन रहे हैं?

हो सकता है जल्द ही।

 

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