Akhand Bharat History in Hindi: अखंड का मतलब होता है जिसका कोई खंड यानी कि टुकड़ा ना कर सके। लेकिन अखंड भारत के मामले में कुछ और ही है। जिस जंबूद्वीप में भारतवर्ष स्थित था। वह भारतवर्ष जंबूद्वीप से भी छोटा था और भारतवर्ष में ही आर्यवर्त स्थित था। लेकिन आज एक ऐसा दौर है कि ना जंबूद्वीप है ना भारतवर्ष और ना ही आर्यवर्त आज हमारे पास केवल हिंदुस्तान है। जिसे हिंदुस्तान भी कहा जाता था, लेकिन यह भी अब नाम मात्र ही बच गया है।

अफगानिस्तान

इस सूची में सबसे पहले हम बात करते हैं। अफगानिस्तान की जिसका निर्माण गंधार और कंबोज के कुछ हिस्सों को मिलाकर हुआ है। इस पूरे क्षेत्र में हिंदू, शाही और पारसी राजवंशों का शासन रहा था। लेकिन बाद में यहां पर बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ। इस दौरान यहां राजा के रूप में भी बौद्ध ही चुने गए। फिर दौर आया सिकंदर के आक्रमण का जिसके बाद यहां पर फारसी और यूनानीयों का शासन चलने लगा। आगे चलकर सातवीं सदी के बाद यहां अरब और तुर्क से आए मुसलमानों ने आक्रमण कर दिया और 870 ईसवी में अरब के सेनापति याकूब एलेस ने अफगानिस्तान को अपने कब्जे में ले लिया यह लड़ाई काफी दिनों तक चली। इस बीच दिल्ली के मुस्लिम शासकों ने जीत हासिल की और यहां अपना कब्जा जमा लिया। दिल्ली के मुसलमान शासकों के बाद यहां ब्रिटिश इंडिया का शासन चला। 26 मई 1876 को गंडामक संधि के तहत रूस और ब्रिटिश के शासकों के बीच यह तय हुआ कि अफगानिस्तान नाम से एक बफर स्टेट यानी कि राजनीतिक देशों को आर्थिक ताकतों के बीच स्थापित किया जाएगा और इस दौरान अफगानिस्तान यानी कि पठान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से अलग हो गया। 18 अगस्त 1919 को अफगानिस्तान को ब्रिटिश शासन से भी आजादी मिल गई।

सिंध(पाकिस्तान)

1712 ईस्वी के दौरान इराकी शासक अल हज्जाज के भतीजे एवं दामाद ने महज 17 वर्ष की उम्र में ही बलूच ने कई अभियान चलाएं और इस दौरान यहां के ज्यादातर हिस्सों पर उन्होंने अपना कब्जा जमा लिया। सन् 638 से लेकर 711 ईसवी तक 74 सालों में सिंध पर 9 खलीफाओं ने करीब 15 बार आक्रमण किया और 15वीं बार आक्रमण का नेतृत्व मोहम्मद बिन कासिम ने किया। इस दौरान सिंध के हिंदु राजा दाहिर ने अपने परिवार समेत मातृभूमि की अस्मिता को बचाने के लिए अपना जान न्योछावर कर दिया। उनके परिवार में उनकी पत्नियां और बेटियां भी शामिल थीं।

पंजाब एवं मुल्तान

बात सन् 977 की है, जब अप्तगीन के दामाद के पुत्र महमूद गजनवी ने बगदाद के आदेशानुसार भारत के कई हिस्सों पर आक्रमण करना शुरू कर दिया। सन् 1001 से लेकर 1026 तक उसने भारत पर करीब 17 बार आक्रमण किए हैं। आखिरकार भारत के कई इलाकों पर कब्जा करने में कामयाब रहा। सिंहासन पर बैठते ही महमूद ने हिंदुओं के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। सन् 1001 में सबसे पहले उसने राजा जयपाल को हराया। 1009 में महाराज आनंदपाल को हराया, इसके बाद उसने फौरन मुल्तान और पंजाब को तहस-नहस करने की रणनीति बनाई। अफगान को अपने कब्जे में लेने की लड़ाई के दौरान पंजाब पर गजनवियों का पूरा अधिकार हो गया। इसके बाद उसने मुल्तान, लाहौर, नारकोट और थानेश्वर की तरफ रुख किया। इस दौरान उसने यहां की एक विशाल भूभाग को अपने कब्जे में ले लिया और यहां बड़े पैमाने पर मारकाट करते हुए। हिंदुओं और बौद्ध धर्म के लोगों को इस्लाम कबूल करवाया। जिन्होंने इस्लाम कबूलने मना किया उसे जान से मार दिया गया।

अगला युद्ध हुआ 1704 में जब उसने कन्नौज और मथुरा दोनों पर हमला किया। इस दौरान उसने बड़े पैमाने पर यहां तोड़फोड़ किया और मंदिरों में भी लूटपाट की। मथुरा के समीप महावन स्थित था। उस दौरान वहां फूलचंद का शासन था। जिन्होंने उसका सामना किया, फूलचंद के साथ गजनवी का भयंकर युद्ध हुआ। गजनवी का 9वां और सबसे बड़ा आक्रमण हुआ सन् 1026 में इस दौरान उसने काठियावाड़ के सोमनाथ मंदिर पर भी आक्रमण कि इस समय यह मंदिर देश की पश्चिमी सीमा प्राचीन कुशस्थली पर स्थित था। जो कि वर्तमान सौराष्ट्र (गुजरात) में है। उसका आखिरी आक्रमण 1027 ईसवी में हुआ।

बलूचिस्तान

बलूचिस्तान को भारत के सोलह महाजनपदों में से एक कहा गया है। ऐसा कहते हैं कि यह गांधार जनपद का हिस्सा रहा था। यह क्षेत्र 321 ईसा पूर्व में चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य में शामिल था। वर्ष 711 में इस पर मोहम्मद बिन कासिम का कब्जा हुआ और फिर आगे चलकर 11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी ने बलूचिस्तान पर आक्रमण कर दिया। यहां भी गजनवी ने लोगों को जबरन इस्लाम कबूल करने पर मजबूर किया। आगे चलकर यह मुगलों और गजनवियों का शासन रहा। जो कि अगले 300 सालों तक चला बलूचिस्तान मुगल साम्राज्य के अधीन तब आया जब यहां अकबर का शासन काल चला।

बलूच राष्ट्रवादी आंदोलन 1666 में स्थापित मीर अहमद के कलात की खानत को अपना आधार मानता है। 1758 में कलात की सीमाएं पूरब में डेरा गाजी खान और पश्चिम में बंदर अब्बास तक फैल गई। ऐसा तब हुआ जब मीर नसीर खान ने अफगान की अधीनता कबूल कर ली, इस दौरान ईरान के नादिरशाह ने कलात के खानों और ब्रहुई आदिवासियों को एकत्रित किया और फिर इनकी मदद से सत्ता पर काबिज हो गए। पहला अफगान युद्ध 1839 से लेकर 1842 तक चला। जिसके बाद अंग्रेजों ने इस पूरे इलाके पर अपना कब्जा जमा लिया। 1876 में रॉबर्ट सैंडमेन को यहां का ब्रिटिश एजेंट नियुक्त किया गया। इतिहासकारों के मुताबिक 1887 तक इसके ज्यादातर इलाके ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन हो गए।

अंग्रेजो के द्वारा बलूचिस्तान को 4 रियासतों में बांट दिया गया। इसमें कलात, मकरान, लसबेला और खारन शामिल थें। आगे चलकर बीसवीं सदी में बलूच ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया। 1939 में अंग्रेजों के द्वारा बनाई गई रणनीति के तहत बलूचों की मुस्लिम लीग पार्टी का जन्म हुआ। जो आगे चलकर हिंदुस्तान के मुस्लिम लीग से जा मिली। दूसरी तरफ एक और राजनीतिक पार्टी का जन्म हो रहा था जिसका नाम था अंजुमन-ए-वतन इस पार्टी का भी आगे चलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ विलय हो गया। इस विलय में खान अब्दुल गफ्फार खान की अहम भूमिका थी।

4 अगस्त 1947 को जिन्ना और यार खान के बीच हुई बातचीत में यार खान इस बात पर राजी हो गया कि 5 अगस्त 1947 को कलात राज्य आजाद हो जाएगा और उसकी स्थिति 1938 की तरह बहाल कर दी जाएगी। उसी दिन पाकिस्तानी संघ के साथ एक समझौते पर दस्तखत हुआ। समझौते में अनुच्छेद 1 के मुताबिक यह लिखा गया कि पाकिस्तान सरकार इस पर रजामंद है कि कलात स्वतंत्र राज्य है। जिसका वजूद हिंदुस्तान के दूसरे राज्यों से एकदम अलग है।

15 अगस्त 1947 को कलात के खान के साथ एक धोखा हुआ, समझौते के अनुच्छेद 4 का फायदा उठाते हुए जिन्ना ने 4 महीने के भीतर ही इस समझौते को तोड़कर 27 मार्च 1948 को कलात को अपने कब्जे में ले लिया। इस वक्त पाकिस्तान ने बलूचिस्तान के बचे हुए तीन अन्य प्रांतों को भी जबरन पाकिस्तान में मिला लिया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पाकिस्तान के इस गैरकानूनी कब्जे के खिलाफ आज भी बलूची अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं। जिसमें अब तक लाखों निर्दोष बलूचियों को पाकिस्तान की सेना ने मार गिराया है। दरअसल हिंदुस्तान और पाकिस्तान से भी पहले बलूचिस्तान आजाद हुआ, बलूचिस्तान की जनता को 11अगस्त 1947 को आजादी मिल गई थी।

दिल्ली में इस्लामिक शासन का इतिहास

जिस वक्त मथुरा मंडल के उत्तर पश्चिम में पृथ्वीराज और दक्षिण पूर्व में जयचंद जैसे महान राजाओं ने अपनी सशक्त राज्य की स्थापना की थी। उसी वक्त भारत के पश्चिमी उत्तर की सीमांत पर शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी ने महमूद गजनवी के वंशजों को हराकर अपने एक नए इस्लामिक राज्य की स्थापना की थी। मोहम्मद गौरी ने 1175 इस्वी में भारत पर अपना पहला आक्रमण किया। यह आक्रमण मुल्तान में किया गया था। उसने अपना दूसरा आक्रमण एक 1178 ईस्वी में गुजरात पर और इसके बाद 1179 से 1186 के बीच पंजाब पर फतह हासिल कर लिया। मोहम्मद गौरी यहीं नहीं रुका उसने 1179 इस्वी में पेशावर तथा 1185 इस्वी में सियालकोट पर भी हमला किया और वहां कब्जा जमाने में कामयाब रहा 1191 इस्वी में उसका युद्ध पृथ्वीराज चौहान से हुआ। इस युद्ध में मोहम्मद गौरी को हार का सामना करना पड़ा। इस युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की सेना ने मोहम्मद गौरी को बंधक बना लिया। लेकिन बाद में उसे छोड़ दिया गया। इस युद्ध को तराइन का प्रथम युद्ध कहा जाता था।

मोहम्मद गौरी को छोड़ना पृथ्वीराज चौहान के लिए आगे चलकर नुकसान देह रहा। 1992 ईस्वी में तराइन का दूसरा युद्ध हुआ, अबकी बार मोहम्मद गौरी ने अपनी पूरी ताकत के साथ पृथ्वीराज चौहान पर हमला किया और युद्ध में चौहान हार गए। इसके बाद गौरी ने कन्नौज के राजा जयचंद को हराया जिस युद्ध को चंदावार की युद्ध के नाम से जाना जाता है। ऐसा कहते हैं कि पृथ्वीराज चौहान के साथ जब मोहम्मद गौरी का दूसरा युद्ध हुआ था। तो उस दौरान कन्नौज के राजा नरेश जयचंद ने मोहम्मद गौरी की मदद की थी। लेकिन आगे चलकर मोहम्मद गौरी ने जयचंद को ही धोखा दे दिया। मोहम्मद गौरी ने अपना यह अभियान आगे भी जारी रखा और उसने दिल्ली में गुलाम वंश का शासन स्थापित कर उत्तर भारत में भी इस्लामी शासन को एक पुख्ता रूप दिया और अंततः अपने देश लौट गया। कहते हैं कि कुतुबुद्दीन ऐबक उसके सबसे काबिल गुलामों में से एक था। जिसने एक साम्राज्य की स्थापना की। जिसकी नींव पर दिल्ली सल्तनत तथा खिलजी, तुगलक, सैयद, लोदी, मुगल आदि राजवंशों की आधारशिला रखी गई थी।

 इसी दौरान इस्लामिक शासन के खिलाफ विरोध भी हुए, अत्याचार के खिलाफ समय-समय पर हिंदुओं ने कड़ा विरोध किया। लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला हिंदू जनता का जबरन धर्म परिवर्तित कराया जाता था। महिलाओं के साथ जास्ती की जाती थी। गुलाम वंश का शासन ज्यादा लंबे समय तक नहीं चला 1206 से लेकर 1290 तक गुलाम वंश ने दिल्ली सल्तनत पर शासन किया। इसके बाद दिल्ली के तख्त पर विदेशी मुस्लिमों ने अपना शासन जमाया जो लगभग 1707 तक चला। औरंगजेब की मृत्यु के बाद यह सिलसिला थम गया।

भारत में अंग्रेज, पुर्तगाली और फ्रांसीसी काल

भारत पर अंग्रेजों, पुर्तगालियों और फारसियों ने एक ही तरीके से अपना कब्जा जमाया। सबसे पहले तो इन्होंने यहां अपनी पैठ व्यापार के माध्यम से जमाई और फिर धीरे सैन्य बल और राजनीति के तहत यहां अपना कब्जा करना शुरू कर दिया। 1618 में जहांगीर ने अंग्रेजों को भारत में व्यापार करने का अधिकार दिया। जहांगीर और अंग्रेजों ने मिलकर 1618 से लेकर 1750 तक भारत के अधिकांश हिंदू रजवाड़ों को छल करते हुए अपने कब्जे में ले लिया।

लेकिन अब तक बंगाल अंग्रेजों से अछूता था। इस दौरान बंगाल का नवाब सिराजुद्दौला काफी सशक्त माना जाता था। लेकिन उसकी भी ज्यादा दिनों तक नही चली। 1957 में उसे भी हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद कंपनी ने ब्रिटिश सेना की मदद से धीरे-धीरे अपने पैर फैलाने शुरू कर दिए। लगभग पूरे भारत पर कंपनी का झंडा लहराने लगा। उत्तर और दक्षिण भारत के सभी मुस्लिम शासकों का शासन समाप्त हुआ। इसके अलावा सिख, मराठा, राजपूत और अन्य शासकों को भी अपने घुटने टेकने पड़े। अखंड भारत के अन्य क्षेत्र जैसे श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार आदि पर भी अपना अधिकार जमाना शुरू कर दिया था। आगे चलकर धीरे-धीरे अंग्रेज पुर्तगाली और फ्रांसीसी अन्य हिस्सों से अपना अधिकार हटाते गए लेकिन इसके साथ ही अखंड भारत टुकड़ों में बढ़ता चला गया।

नेपाल

नेपाल भी कभी अखंड भारत का हिस्सा हुआ करता था। जिसे देवघर के नाम से भी जाना जाता था। भगवान श्री राम की पत्नी सीता का जन्म स्थल मिथिला नेपाल में हुआ है। नेपाल में स्थित जनकपुर में सीता माता की जन्म स्थली पर एक विशाल मंदिर भी बना हुआ है। जहां माता सीता की पूजा की जाती है। इसके अलावा भगवान बुध का जन्म भी नेपाल में ही हुआ था। उनका जन्म नेपाल के लुंबिनी में हुआ है। यहां पर 1560 पूर्व से ही हिंदू आर्य लोगों का शासन रहा। यह 250 ईसा पूर्व के साम्राज्य का एक हिस्सा बना। आगे चलकर चौथी शताब्दी में गुप्त वंश एक जनपद में परिवर्तित हो गया। इसके बाद सातवीं शताब्दी में इस पर तिब्बत का अधिपत्य हो गया।

11वीं शताब्दी में नेपाल में ठाकुर वंश के राजा राज्य करने लगे। ठाकुरी वंश के राजा के बाद यहां मल्ल वंश का शासन रहा। उसके बाद यहां गोरखाओं ने अपना राज चलाया। सदियों से चली आ रही मध्यकाल के रजवाड़ों की प्रतिद्वंद्विता को समाप्त करने का श्रेया गोरखा राजा पृथ्वी नारायण शाह को दिया जाता है। राजा पृथ्वी नारायण शाह ने सन् 1765 में नेपाल में एक तरह के एकता मुहिम की शुरुआत की। इस दौरान मध्य हिमालय के 46 से अधिक छोटे-बड़े राज्यों को संगठित करने में वह सफल हुए। 1768 में यहां एक आधुनिक नेपाल का जन्म हुआ। भारत में स्वतंत्रता संग्राम का दौर शुरू हो चुका था। इस दौरान स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ते वक्त नेपाल में ही शरण लेते थे। इस बात की जानकारी जब अंग्रेजों को मिली। तो अंग्रेजों ने एक रणनीति के तहत 1904 में तत्काल के बिहार में स्थित सुगौली नाम के स्थान पर राजाओं के नेता से संधि कर लिया और नेपाल को एक आजाद देश का दर्जा दे दिया। इस प्रकार नेपाल एक स्वतंत्र राज्य तो घोषित हो गया। लेकिन फिर भी अप्रत्यक्ष रूप से नेपाल अंग्रेजों के अधीन ही रहा।

इसके बाद से यहां प्रेसिडेंट के बिना महाराजा पृथ्वी नारायण शाह को कुछ भी खरीदने तक की अनुमति नहीं मिलती थी। यही कारण रहा कि राजा महाराजाओं में यहां तनाव रहा करता था।

दरअसल ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने शाह राजवंश के पांचवे राजा राजेंद्र विक्रम शाह के शासनकाल के दौरान भी नेपाल को कब्जे में लेने का प्रयास किया था। इस दौरान उन्होंने सीमावर्ती के कुछ इलाकों पर कब्जा भी कर लिया। जिसके खिलाफ 1815 में एक लड़ाई छेड़ दी गई। इस लड़ाई का अंत सुगौली संधि के बाद हुआ।

नेपाल की स्वतंत्रता पर कभी भी आंच ना आने के पीछे का कारण यह है कि 1857 में भारत में क्रांति हुआ। तब नेपाल ने अंग्रेजों का साथ दिया था सन् 1923 में ब्रिटेन और नेपाल के बीच एक संधि हुई। जिसके तहत नेपाल की स्वतंत्रता को स्वीकार कर लिया गया।1946 के दशक में नेपाल में लोकतंत्र समर्थन आंदोलन की शुरुआत हुई। इस दौरान यहां 1991 में पहली बहुदलीय संसद का गठन किया गया और इसी तरह नेपाल से राजशाही शासन का अंत हो गया। नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था। लेकिन वर्तमान में वामपंथी वर्चस्व होने के कारण अब एक धर्मनिरपेक्ष देश है। हालांकि आज भी नेपाल के राजवंश और भारत के राजवंश के बीच गहरा रिश्ता है।

भूटान

भूटान भी कभी अखंड भारत का हिस्सा हुआ करता था। इतिहासकारों के मुताबिक यह विदेही जनपद का हिस्सा हुआ करता था। भूटान में वैदिक और बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग रहते हैं। भूटान सांस्कृतिक और धार्मिक तौर पर तिब्बत से ज्यादा जुड़ा हुआ है। यहां का राजधर्म बौद्ध है तिब्बत एक समय पर जंबूद्वीप खंड का त्रिविष्टप क्षेत्र हुआ करता था। यह किंपुरुष का एक जनपद था। परंतु किंपुरुष भारतवर्ष के अंतर्गत नहीं आता है। जहां तक सवाल है भूटान का कुछ हिस्सा तिब्बत के अंतर्गत नहीं आता है। भूटान भौगोलिक रूप से भारत से जुड़ा हुआ है। यहां तक कि ‘भूटान’ नाम का उत्थान भी संस्कृत के शब्द से हुआ है।

अंग्रेजों ने सन् 1906 में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान सिक्किम और भूटान को भी अपने कब्जे में लिया और प्रत्यक्ष रूप से अपना एक रेजिडेंट स्थापित किया। ब्रिटिश नेतृत्व के तहत 1960 में वहां राजशाही की स्थापना हुई। इसके ठीक 3 साल बाद एक और समझौता हुआ। जिसके तहत यह तय किया गया कि ब्रिटिश भूटान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। लेकिन भूटान की विदेश नीति इंग्लैंड के द्वारा ही तय की जाएगी। 1947 में जब भारत आजाद हुआ तब इसके कुछ साल बाद 1949 में भारत और भूटान के बीच एक समझौता हुआ। जिसके तहत भारत ने भूटान की वह सभी जमीने लौटा दी जो अंग्रेजों के अधीन हुआ करती थी। इस समझौते के दौरान भारत ने भूटान को यह वचन दिया कि भविष्य में भारत भूटान को रक्षा और सामाजिक सुरक्षा देगा।

तिब्बत

तिब्बत को इतिहास काल में ‘त्रिविष्टप’ कहा जाता था। जहां ‘रिशिका’ और ‘तुषारा’ नामक राज्य हुआ करते थे। तिब्बत में सबसे पहले हिंदू और फिर बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार हुआ। आगे चलकर तिब्बत बौद्ध धर्म के लोगों का प्रमुख केंद्र बन गया। यहां शाक्यवंशियों का शासनकाल 1207 ईस्वी में प्रांरभ हुआ। लेकिन आगे चलकर यहां चीन के राजा ने शासन किया। 19वीं शताब्दी तक तिब्बत ने अपनी स्वतंत्र सत्ता को बचाए रखा। यही वो वक्त था जब लद्दाख पर कश्मीर के शासक और सिक्किम पर अंग्रेजों ने अपना आधिपत्य जमा लिया। सन् 1907 के लगभग चीन और ब्रिटिश इंडिया के तहत बैठक हुई और इसे दो भागों में विभाजित कर दिया गया। पूर्वी भाग चीन के पास चला गया और दक्षिणी भाग लामा के पास रहा। 1951 में एक और संधि हुआ इसके मुताबिक यह साम्यवादी चीनी प्रशासन के तहत स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया। लेकिन इस दौरान स्वतंत्र भारत के राजनेताओं से एक बहुत बड़ी भूल हो गई थी।

फिर चीन और ब्रिटिश इंडिया के बीच 1907 के लगभग बैठक हुई और इसे दो भागों में विभाजित कर दिया। पूर्वी भाग चीन के पास और दक्षिणी भाग लामा के पास रहा। 1951 की संधि के अनुसार यह साम्यवादी चीन के प्रशासन में एक स्वतंत्र राज्य घोषित कर दिया गया। इस दौरान स्वतंत्र भारत के राजनेताओं ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मानकर बड़ी भूल की थी।

म्यांमार

एक वक्त था, जब म्यांमार ‘ब्रह्मदेश’ हुआ करता था। इसे आज बर्मा भी कहते हैं, जोकि ब्रह्मा का अपभ्रंश है। म्यांमार काफी पहले से ही भारत का हिस्सा रहा है। जिस बात का जिक्र इतिहास में भी किया गया है। अशोक के काल में यहां बौद्ध धर्म का पूर्वी केंद्र था। यहां की सभ्यता और संस्कृति दुनिया के लिए मिसाल थी। मुस्लिम काल में भी म्यांमार शेष भारत से कटा रहा। इस दौरान यहां स्वतंत्र तौर पर राज्य सताएं काबिल नहीं थी। लेकिन 1886 ईसवी में पूरा देश ब्रिटिश साम्राज्य के अंतर्गत आ गया और इस साम्राज्य का नाम दिया गया ब्रिटिश भारतीय साम्राज्य आगे चलकर 1935 ईस्वी में भारतीय शासन विधान के अंतर्गत म्यांमार को भी भारत से अलग अलग कर दिया गया।

1935 से लेकर 1937 तक ईसाइयों का ध्यान म्यांमार पर केंद्रित रहा। उन्हें ऐसा लगा कि भविष्य में उन्हें कभी भी भारत या एशिया रुख करना पड़ सकता है। इसके बाद समुद्र में अपना नौसैनिक बेड़ा बैठाने, उसके समर्थक राज्य स्थापित करने तथा स्वतंत्रता संग्राम से उन भू-भागों व समाजों को अलग करने हेतु सन् 1935 में श्रीलंका व सन् 1937 में म्यांमार को अलग राजनीतिक देश की मान्यता दे दी।

श्रीलंका

लंका एक उपमहाद्वीप है, जो कि दक्षिण में हिंद महासागर पर स्थित है। श्रीलंका उपमहाद्वीप भारत के चोल और पांडेय जनपद के अंदर आता था। करीब 2350 साल पहले तक श्रीलंका किस संपूर्ण आबादी वैदिक धर्म का पालन करते थे। इस दौरान सम्राट अशोक ने अपने पुत्र महेंद्र को श्रीलंका में बौद्ध धर्म के प्रचार प्रसार के लिए भेजा था। वहां के सिंहल राजा ने बौद्ध धर्म अपनाकर श्रीलंका में इसे राजधर्म घोषित कर दिया। अगर बौद्ध और हिंदू धर्म के ग्रंथों को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि प्राचीन काल में यहां शैव, यक्ष और नागवंशियों का राज हुआ करता था। अगर कोई व्यक्ति श्रीलंका की प्राचीन इतिहास के बारे में जानना चाहता है। तो उसे इस बात के लिखित स्रोत सुप्रसिद्ध बौद्ध ग्रंथ ‘महावंश’ में मिल जाएंगे।

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