Lord Shiva Lakshamaneshwar Temple chhatisgarh: भगवान शिव जिन्हें देवों का देव महादेव कहा जाता है, अपने आप में काफी रहस्यों से भरे हुए हैं। बता दें कि भगवान शिव का सार आज तक कोई नहीं पा सका है। भारत देश में भोले नाथ के कई ऐसे मंदिर हैं जो अपने चमत्कारों और रहस्यों को लेकर काफी प्रसिद्ध हैं। हमने आपको इस कड़ी में भगवान शिव के ऐसे ही कई मंदिरों के बारे में बताया है जो चमत्कारों और रहस्य का पिटारा है और इसी कड़ी में हम आपको भगवान शिव जी के एक ऐसे ही चमत्कारी मंदिर के बारे में बताएंगे जिसके रहस्य को आज तक कोई नहीं जान सका है।

बता दें कि भगवान शिव के मंदिर में स्थित इस शिवलिंग में एक लाख छिद्र हैं। जिनमें से एक छिद्र ऐसा भी है जो सीधे पाताल लोक जाता है। इस छिद्र में चाहे कितना भी जल चढ़ाओं इससे एक भी बूंद बाहर नहीं छलकती है और वो पूरे पानी को अपने आप में समावेशित कर लेता है। लोगों की ऐसी मान्यता है कि यह छिद्र सीधे पाताल लोक जाता है और यही कारण है कि यह शिवलिंग अपने आप में अद्भुत है और इस शिवलिंग के अन्य शिवलिंगों में अलग पहचान है।

बता दें कि भोले बाबा का यह मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग 120 किलोमीटर दूर और शिवरीनारायण से तकरीबन 3 किलोमीटर दूर खरौद में स्थित है। इस मंदिर को लक्ष्मणेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि इस शिवलिंग में लाखों छिद्र हैं और संस्कृत में छिद्र को लाख भी कहा जाता है इस वजह से इस मंदिर का दूसरा नाम लक्षलिंग भी है।

इस मंदिर को लेकर लोगों की ऐसी मान्यता है कि इस शिवलिंग की पूजा करने से संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही सावन और महाशिवरात्रि पर इस शिवलिंग में चावल के एक लाख दाने चढ़ाए जाने की प्रथा भी काफी प्रचलित है। बता दें कि इस मंदिर के निर्माण को पीछे एक कथा काफी प्रचलित है जो कि इस प्रकार है।

मंदिर के निर्माण के पीछे है पौराणिक कथा

Lakshamaneshwar temple
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कहा जाता है कि जब श्रीराम ने सीता को रावण से छुड़ाने के लिए उसका वध कर दिया था तो उन पर ब्राह्मण हत्या का पाप लगा था, क्योंकि रावण एक ब्राह्मण था। इस पाप से मुक्ति पाने हेतु राम और लक्ष्मण शिवलिंग की स्थापना करना चाहते थे। शिवलिंग का जलाभिषेक करने के लिए लक्ष्मण दुनिया भर के सभी प्रमुख तीर्थ स्थलों से जल लेकर के आए। जब लक्ष्मण गुप्त तीर्थ शिवरीनारायण से जल लेकर अयोध्या के लिए वापस निकले तो उस दौरान उनकी तबीयत खराब हो गई और वो रोगग्रस्त हो गए। अपने इस रोग से छुटकारा पाने के लिए लक्ष्मण ने भगवान शिव की आराधना करनी शुरू कर दी।

भोले बाबा लक्ष्मण की भक्ति से प्रसन्न हुए और उन्होंने लक्ष्मण को दर्शन दिए और लक्षलिंग रूप में विराजमान होकर लक्ष्मण को पूजा करने के लिए कहा। शिव जी के कहानुसार लक्ष्मण शिवलिंग की पूजा करने के बाद रोग मुक्त हो गए और इसी के साथ उनके ऊपर से ब्रह्म हत्या का पाप भी हट गया, जिसके बाद यह शिवलिंग लक्ष्मणेश्वर (Lakshamaneshwar) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

कैसे और किसने की इस शिवलिंग की स्थापना

Lakshamaneshwar
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बता दें कि बाद में इस शिवलिंग पर मंदिर का निर्माण राजा खड्गदेव ने कराया था। लोगों के अनुसार यह मंदिर छठी शताब्दी का बना हुआ है। इस मंदिर के बाहर ही राजा खड्गदेव और उनकी धर्मपत्नी की हाथ जोड़े हुए मूर्तियां भी विघमान हैं।

क्यों पड़ा इस जगह का नाम खरौद

बता दें कि रामायण काल में इस जगह पर श्री राम ने दो राक्षस खर और दूषण का वध किया था, जिसकी वजह से इस जगह को श्री राम की कीर्ति के रूप में खरौद कहा जाता है। बता दें कि सनातन यानि की हिंदू धर्म में मूर्ति पूजा का अत्यधिक महत्व है, लेकिन इसी के साथ घर में खंडित मूर्तियां रखना व उनकी पूजा करना वर्जित और अशुभ माना जाता है, लेकिन शिवलिंग की बात करें तो इसके खंडित होने पर भी इसकी पूजा का विधान है। कहा जाता है कि खंडित शिवलिंग की पूजा करना भी व्यर्थ नहीं हैं। क्योंकि भगवान शिव के ऐसे कई मंदिर हैं जो अनोखे हैं और जिनकी पूजा के लिए भक्तगण दूर-दूर से आते हैं।

भगवान शिव का एक नाम भोले बाबा भी है, क्योंकि भगवान शिव अपने भक्तों की अरदास जल्दी सुन लेते हैं और बहुत ही जल्द प्रसन्न हो जाते हैं। जिस वजह से इनके भक्त इनको भोले बाबा के नाम से भी जानते हैं। बता दें कि भोले बाबा अपने भोलेपन के साथ अपने रौद्र रूप के लिए भी जाने जाते हैं। इन्हें सृष्टि का रचयिता भी कहा जाता है और सृष्टि का संहार करने वाला भी।

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