Upnayan Sanskar in Hindi: हिन्दू धर्म और संस्कारों के मुताबिक कुल 16 संस्कार होते हैं। इन्हीं में से एक संस्कार होता है यज्ञोपवित संस्कार, इस संस्कार को उपनयन संस्कार भी कहते हैं। यह सभी संस्कारों में 10वें स्थान पर आता है। अर्थात यह हिन्दू धर्म का दशम संस्कार है। हिन्दू धर्म में इस संस्कार का काफी महत्व है। इस संस्कार को देने के साथ-साथ बालक को उसके जीवन के भौतिक एवं आध्यत्मिक उन्नति मार्ग के लिए प्रशस्त किया जाता है। धार्मिक परंपरा के मुताबिक इस संस्कार में वेदारम्भ-संस्कार का भी समावेश होता है। इस संस्कार को देने के दौरान मटुक(जिस बालक को संस्कार दिया जाता है) को गायत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है। साथ ही युवक को यज्ञोपवित(जनेऊ) धारण कराया जाता है। हर किसी की अपनी-अपनी शाखा होती है और उसे उसकी शाखा के अनुसार वेदाध्ययन कराया जाता है। वैसे तो आज के समय में अपनी क्षमता और सार्थकता के अनुसार ही उपनयन संस्कार कराया जाता है। लेकिन अगर नियमों की मानें तो यह संस्कार ब्राह्मण बालक का आठवें वर्ष में, क्षत्रिय बालक का ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य बालक का बारहवें वर्ष में होता है। हिन्दू धर्म में कन्याओं को इस संस्कार को धारण करने का अधिकार नहीं दिया गया है। इस संस्कार को लिए बगैर बालक विवाह करने के लिए सार्थक नहीं माना जाता है।

‘उपनयन’ का अर्थ है “पास या सन्निकट ले जाना।” लेकिन कहीं इस बात का जिक्र नहीं है कि किसके समीप या निकट ले जाने की जाती है। संभवतः बालक को शिक्षा एवं दीक्षा दोनों ही उसके गुरु देते हैं तो ऐसा आभास होता है। कि बात गुरु के समीप लाने की की जा रही है।

उपनयन संस्कार का उद्गम एवं विकास

  1. उपनयन संस्कार सभी संस्कारों में सबसे उच्च एवं महत्वपूर्ण माना गया है। उपनयन संस्कार का मूल भारतीय एवं ईरानी है, क्योंकि प्राचीन ज़ोराँस्ट्रिएन (पारसी) शास्त्रों के अनुसार पवित्र मेखला अधोवसन (लुंगी) का सम्बन्ध आधुनिक पारसियों से भी है। ऋग्वेद में ‘ब्रह्मचारी’ शब्द आया है। ‘उपनयन’ शब्द दो प्रकार से समझाया जा सकता है।
    1. बच्चे को आचार्य के सन्निकट ले जाना,
    2. वह संस्कार या कृत्य जिसके द्वारा बालक आचार्य के पास ले जाया जाता है।
    पहला अर्थ आरम्भिक है, किन्तु कालान्तर में जब विस्तारपूर्वक यह कृत्य किया जाने लगा तो दूसरा अर्थ भी प्रयुक्त हो गया।

उपनयन संस्कार का महत्व

जिस भी बालक को युवा अवस्था में उपनयन संस्कार ग्रहण करवाया जाता है। इसके पीछे एक ही मकसद होता है, वह है उसकी शिक्षा और दीक्षा को आरंभ करना। जैसा कि हम सब जानते हैं शिक्षा मनुष्य के जीवन में निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है। जिससे वह अपना विकास करता है और जीवन यापन के लिए खुद को तैयार करता है। प्राचीन युग में गुरु और शिष्य को एक साथ रखा जाता था। ताकि शिष्य गुरु के समीप रहकर उनसे ज्ञान ले सके और अपने जीवन में सदैव विजय प्राप्त करे। उपनयन का अर्थ ही होता है समीप। शास्त्रों के मुताबिक हर मनुष्य जन्म से ही शुद्र पैदा होता है। लेकिन संस्कारों को ग्रहण करके वह जातक द्विज हो जाता है।

कब होता है उपनयन संस्कार

उपनयन संस्कार मनुष्य जीवन में उसके नवम संस्कार कर्णवेध यानी कनछेदन संस्कार के बाद किया जाता है। प्राचीन समय में वर्णाश्रम व्यवस्था के तहत भिन्न वर्णों के लिये भिन्न समयानुसार उपनयन संस्कार करने का विधान रहा है। शास्त्रानुसार यह ब्राह्मण वर्ण के जातकों का आठवें वर्ष में तो क्षत्रिय जातकों का ग्यारहवें एवं वैश्य जातकों का उपनयन बारहवें वर्ष में किया जाता था। शूद्र वर्ण व कन्याएं उपनयन संस्कार की अधिकारी नहीं मानी जाती थी। जिन ब्राह्मण जातकों की तीव्र बुद्धि हो उनके लिये उपनयन संस्कार वर्णानुसार पांचवें, जो क्षत्रिय जातक शक्तिशाली हों उनका छठे व जो वैश्य जातक कृषि करने की इच्छा रखते हों उनका उपनयन आठवें वर्ष में किया जा सकता था। एक तय की गई आयु सीमा तक अगर किसी बालक का उपनयन संस्कार नहीं होता है तो उसे व्रात्य कहा जाता है। ऐसे जातकों की समाज में निंदा भी की जाती है।

जाने उपनयन संस्कार की विधि के बारे में

प्राचीन काल में उपनयन संस्कार के लिए शिष्य को गुरु के पास भेजा जाता था। ताकि वह गुरु से ज्ञान प्राप्त करके अपने देश या साम्राज्य में वापस आ सके। लेकिन आज के समय में वक्त की कमी होने के कारण एक सही समय निर्धारित किया जाता है। तब बालक को उपनयन संस्कार ग्रहण करवाया जाता है। हिंदू धर्म में यह एक विवाह के समारोह के तरह मनाया जाता है। इसमें जातक को उसके गुरु के द्वारा सारे मंत्र और दीक्षा की जानकारी दी जाती है। और साथ ही उसे अपने परिजनों के सामने भिक्षा लेने के लिए भेजा जाता है। इस दौरान वह अपने सिर के बाल को मुड़वा कर एक ब्राह्मण का वेष भूषा धारण करता है। और कम से कम वस्त्र धारण करता है। उपनयन संस्कार के बाद से जातक को ताउम्र जनेऊ धारण करना होता है। जिसे ब्रह्मसूत्र भी कहते हैं, इसे बनाने की एक विधि होती है और इसे ग्रहण करने के बाद भी कुछ नियम कानून का पालन करना पड़ता है। उपनयन संस्कार के दौरान कुछ बातें जातक के गुरु के द्वारा कही जाती हैं।

जिनका पालन करना उसका परम कर्तव्य होता है। जैसे प्रार्थना एवं सायंकाल में उठ कर नित्य क्रिया कर्म और अपने वरिष्ठ का आशीर्वाद देना शामिल होता है। इसके अलावा महिलाओं के बीच में बैठना। किसी दूसरे की बुराई करना मांस मदिरा का सेवन करना निषेध होता है। अगर जातक इन नियमों का पालन नहीं कर सकता तो उसे जनेऊ धारण नहीं करना चाहिए। इससे ब्रह्म सूत्र का अपमान होता है। उपनयन संस्कार के बाद परिजनों के द्वारा ब्राह्मण भोजन का भी आयोजन होता है। लेकिन आज आधुनिक युग में रिश्तेदारों को बुलाकर तरह-तरह के पकवान परोस कर एक पार्टी का आयोजन किया जाता है। प्राचीन समय में हर जाती के लोग जो भी हिंदू धर्म से जुड़े हैं। वह उपनयन संस्कार ग्रहण करते थें और ब्रह्मचर्य का पालन भी करते थें साथ ही जनेऊ को धारण करने के बाद जिन नियमों का पालन करना होता है। उनका निर्वाह किया करते थें। लेकिन आज उपनयन संस्कार ज्यादातर क्षत्रिय और ब्राह्मण समाज तक ही सिमटकर रह गया है।

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