देश की बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए सरकार कई तरह की योजनाएं लाती हैं। कई ऐसे कार्यक्रम चलाए जाते हैं जिससे लोगों को यह बात समझ में आये कि छोटा परिवार सुखी परिवार। वहीं जिस परिवार के 2 बच्चे होते हैं उन्हें कई जगहों पर छूट भी मिलती है। इस तरह की छोटी बड़ी कई स्कीमे हैं जो सरकार लेकर के आई है। बीते कुछ सालों से इस तरह की योजनाओं ने काफी जोर पकड़ा है। जहां कुछ लोग इस योजना से प्रभावित होकर इस पर अमल कर रहे हैं वहीं कई लोगों के कानों में अभी तक जूं नहीं रेंगी है।

लेकिन आज हम आपको एक ऐसे गांव के बारे में बताएंगे जहां पर लोग आज से नहीं बल्कि लगभग पिछले 100 सालों से जागरूक हैं। जी हां, हम जिस गांव की बात आज करने जा रहे हैं वहां पर 97 सालों से जनसंख्या बढ़ी नहीं है। ये बात सुनकर आपको यकीन नहीं हो रहा होगा कि आखिर ऐसा कैसे हो सकता है कि 97 सालों से किसी गांव में लोग ना कम हुए हों ना बढ़े हों। लेकिन एक गांव हैं जहां ऐसा वाकई में हुआ है, तो चलिए आपको बताते हैं इस गांव के बारे में।

मध्य प्रदेश में स्थित है गांव [Madhya Pradesh Betul Jilla]

betul madhya pradesh
Betul

मध्य प्रदेश के बैतूल जिले के पास धनोरा नाम के गांव में पिछले 97 सालों से वहां की जनसंख्या 1700 पर आकर टिक गई है। इस बात पर विश्वास कर पाना थोड़ा मुश्किल है लेकिन इस गांव के लोग बीते 97 सालों से ही इतने जागरूक हैं कि उन्होंने अपने गांव की जनसंख्या को बढ़ने नहीं दिया है। हालांकि, 97 सालों से गांव की जनसंख्या को 1700 रखने के पीछे गांव वालों ने क्या नियम बनाएं होंगे और उनके ऐसा करने के पीछे की वजह क्या है इन सबसे जुड़ी हुई एक कहानी है। जिस वजह से इस गांव के निवासी 97 सालों से अपने गांव की जनसंख्या को स्थिर रखे हुए हैं।

पीछे जुड़ी है ये कहानी [ Dhanora Madhya Pradesh]

Dhanora
Jagran

बता दें कि इस गांव में ऐसा क्यों किया जाता है और इसके पीछे की वजह क्या है, उसके बारे में वहां के एक स्थानीय निवासी एस.के माहोबया ने बताया कि साल 1922 में कांग्रेस ने गांव में एक बैठक बुलाई थी। इस बैठक में बहुत से अधिकारी शामिल हुए थे। इस बैठक में गांधी जी की पत्नी कस्तूरबा गांधी ने भी हिस्सा लिया था।

कस्तूरबा गांधी ने ही उस बैठक के दौरान नारा दिया था कि छोटा परिवार सुखी परिवार। कस्तूरबा गांधी के इस नारे से गांव वाले बहुत अधिक प्रभावित हुए थे, उन्होंने इस नारे में कही गई बात को तुरंत ही सुनकर समझ लिया था। इस नारे को उन्होंने अपने जीवन में उतार भी लिया। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि, “उनके इस संदेश को गांव के सभी लोगों ने इतनी अच्छी तरह से लिया कि हर एक परिवार ने  परिवार नियोजन की अवधारणा को अपनाया। इसमें भी सबसे अच्छी बात ये है कि गांव वालों ने इस बात को समझा कि लड़के और लड़की में कोई अंतर नहीं होता है”।

हर परिवार में हैं दो बच्चे

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जानकारी के अनुसार इस गांव में किसी भी घर में दो से ज्यादा बच्चे नहीं हैं। इसी के साथ उससे भी अच्छी बात यह है कि यहां के लोग लड़का और लड़की में भेदभाव नहीं करते हैं। इसलिए उनके दोनों बच्चे बेटे हैं या बेटी उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है। गांव वालों का बस एक ही मानना है कि छोटा परिवार सुखी परिवार, उसमें लड़का हो या लड़की इस बात का उन्हें फर्क नहीं पड़ता। कस्तूरबा गांधी के उस नारे को आज तक गांव के लोगों ने विरासत में ले रखा है, तभी बीते 97 सालों से वहां की आबादी बढ़ी नहीं है।

बना हुआ है जनसंख्या का संतुलन

बता दें कि धनोरा के आसपास कई गांव हैं जहां पर बीते कई सालों से जनसंख्या में काफी तेजी से वृद्धि हुई है। आंकड़ों की मानें तो बीते 97 सालों में उन गांवो में लगभग चार गुना जनसंख्या की वृद्धि हुई है। लेकिन वहीं धनोरा गांव में जनसंख्या का संतुलन बना हुआ है। धनोरा गांव के लोग परिवार नियोजन की अवधारणा और लाभ के बारे में बहुत जागरूक हैं। इसलिए वहां के नागरिकों को कुछ भी समझाने और बताने की जरूरत नहीं पड़ती है। इसी के साथ यह गांव सिर्फ भारत के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए परिवार नियोजन का एक अच्छे मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

यह गांव देश और दुनिया के लिए एक मिसाल बन सकता है, जहां पर कस्तूरबा गांधी जी द्वारा कहे गए एक नारे ने लोगों के मन में इस तरह के विचार लाए, जो बीते 97 सालों से लोगों के मन में बसे हुए हैं। इस गांव के लोगों के बीच यह नारा एक विरासत की तरह मिला है, जो हर पीढ़ी को मिलता ही जा रहा है और आने वाली हर पीढ़ी इसे अपनाकर इस पर अमल भी कर रही है।

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